घूम घूमकर डौगी घर के जंजाल से
खाता रहता खाना भालू मामा थे परेशान
फुर्सत के छन बैठकर रोज खरीदकर लाते
गाता रहता गाना पर घट जाता सामान
बैठे बैठे बोर हो गया मामी के फरमाइश पर
तो घुस गया घर के अंदर पुराते रहते नमक तेल
पहले से आंगन में घर भी लगने लगा उसको
बैठा था एक बंदर एक प्रकार का जेल
हंडे में मुह डालकर घटता था कभी दाल
खा रहा था जूठन घट जाता कभी आटा
डौगी को देखकर ही यही वजह था मामा का
हुआ बदन में ऐठन छुट गया सब सैर सपाटा
दोनों में होने लगा मिलता मामा को खाने
कसकर हाथापाई बरबस वासी रोटी
शोर सुनकर भीतर से मामा दुबले पतले
निकला पप्पू भाई पर मामी बन गई मोटी
दोनों के पीठ पर एक दिन की बात है
मारा कसकर डंडा दोनों में हुआ तकरार
भागे दोनों छोरकर मौका पाकर रात में
आंगन में ही डंडा मामा हुए फरार
लालच ने दोनों के मामा जी ने सोचा
पीठ में ला दी मोच चलो चले हरिद्वार
लालच बुरी बाला है गंगा दर्शन के साथ ही
बदलो तुम भी सोच
कुछ तो होगा व्यापर
वन गए मामा जी
हरिद्वार के वासी
साधू संतो के संग
वन गए वे सन्यासी